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Thursday, May 26, 2016

Skin (April Lindner)

April Lindner (Author), Robert A. Fink (Introduction)

Haven’t we all been told how beauty is thin as truth? And don’t we believe and disbelieve this “lie we’d carve and starve for. / We’d suck it till the juice ran down our arms”? Skin compels us, repels us. Beauty may be only skin deep, a fine covering—sensuous, at times translucent, almost transparent, and yet so obdurate. Skin insulates, guarding its vital organs just beneath this surface that teases us to peek, to try to penetrate. We call this desire by many names, the best of which is love. April Lindner’s sensuously orchestrated collection of poems conveys the beauty and truth of love, how we know it to be paradoxical, obsessive, fearful, rapacious, holy.—Robert FinkFontanelHere’s the ravine, a stretch of skinspanning the breach like a footbridge.Canvas-thin, it trembles with the bloodthat runs beneath. Something less tangiblecourses there too, a whitewater flumeof images: the stretching housecat;car keys that sing and catch light;floorboards knotted with dark, animal eyes;the window with its shifting square of sky.All things equal, each thing startling,and everything unmediated by the mind’shabitual grapple with whyand so what. You frown at a fadedwallpaper pineapple, and the membraneflutters harder. I’m carefulwhen I comb your sparse brown hair.When I sing your name I borrow a liltI’d never use in speech. The wordsdon’t matter; I’m saying drink me while you can,like milk. Let me be flesh and flannel,hands that loosen your tangled blanket.Know me by scent before you learn my name,before doorknobs turn into doorknobs,before the gates knit shut. 

Type: Poetry collection, Hardcover, 88 pages
Published:  March 15th 2002 by Texas Tech University Press (first published March 2002)
Original Title: Skin (The Walt Mcdonald First-Book Poetry Series)
ISBN: 0896724840 (ISBN13: 9780896724846)
Edition Language: English

Tuesday, January 28, 2014

मोहित शर्मा (ज़हन) - Mera Girvi Samaj Gawara Nahi

अखंड भारत एक शब्द ही नहीं एक मिसाल भी है कि विविधता से भरा देश खुद में कितने घटक समाये हुये है।  पर आज़ादी के बाद से ही राजनैतिक मतलबों के लिए और प्रगति कि आड़ में किसानो, कबीलो के मौलिक अधिकारो का हनन होता रहा है। जिसने आवाज़ उठायी उसको हिंसा कि विचारधारा का समर्थक बता कर जेल भेजा गया, मार दिया गया या वो गायब हो गया। अशिक्षा और जागरूकता कि कमी के कारण से ये सिलसिला निरंतर चलता रहा। कुछ इलाको में समानांतर सरकारो, विद्रोह के जन्म से सरकार को अपनी गलत, एकतरफा नीतियों के बचाव के साथ उनको बढ़ाने का मौका भी मिल गया। भारत कि जनसँख्या में 8.6 प्रतिशत अनुपात के अनुसार इन पर सरकारी मदद, खर्च एवम योजनायें नहीं चलायी गयी। बड़ी अर्थव्यवस्था में आदिवासी वर्ग के अधिकार निजी-कॉर्पोरेट संस्थानो के लिए बलि चढ़ाये जा रहे है। देश का विकास इन लगभग 11 करोड़ देशवासियों को साथ लेकर कि किया जा सकता है, इनकी अनदेखी करके या इनसे लड़कर नहीं। एक आदिवासी नेता कि इसी व्यथा पर ये कविता प्रस्तुत है, जहाँ लगने लगे अपने देश में ही अपना वर्ग राजनीति द्वारा किसी और मतलब के लिए गिरवी रखवा दिया हो।  



मेरा समाज गिरवी...गवारा नहीं!

(14 December 2013)

समां गिरवी गवारा नहीं,
जहाँ गिरवी गवारा नहीं।

आसमाँ फिरोज़ी ना लगता,
कहीं सुर्ख यह नज़ारा तो नहीं ?

शायद गुस्ताखी है सियासत से दूर...मिट्टी के पास रहना,
यूँ रह-रह कर नज़रियों का फर्क सहना,
अपनी नज़र में माँ सी ज़मीनो कि कीमत नहीं,
उनकी नज़र में हमारी कागज़ी जानो कि हैसियत नहीं।

बगावत फितरत में नहीं किस्मत में घुली।
वो कबीला खुद में खूबसूरत रहा, 
उन पीढ़ियों कि रूह जाने कब फ़िज़ाओ में मिली?

क़ातिल लगे आदिवासी सीरत भोली,
लगती रही कबसे जिनकी कीमत-बोली।
हक़ में आवाज़ अगर उठ जाये..… 
चलवा दो दूर उस गुमनाम गाँव पर गोली।

ऊँची हैसियत से मेरी गलतियों कि मिसाल दो..... 
देखो अब बारिश साथ मे तेज़ाब ले आयी,
इसको दोष भी हम पर डाल दो। 

दूर है पर गूँगे नहीं,
अपनी पहचान को भटकतें कहीं।
हक़ कि जंग तो है ही डायन,
हमसफ़र सैलाबों में किनारा नहीं।

समां गिरवी गवारा नहीं,
जहाँ गिरवी गवारा नहीं।

- मोहित शर्मा (ज़हन)


Sunday, January 5, 2014

The Cost of Pseudo-Secularism in Current India

The Cost of Pseudo-Secularism in Current India.

खुद
को शांतिदूत बनाने में , मै जीवन का सार भुला  बैठा 

दहशतगर्दो को शरण देकर , मै अपने घर में आग लगा बैठा

चंद तारीफों के लालच में, अपने पूर्वजो के दिए संस्कारो पे थूका

ऐसे झूठे आदर्शो की  खातिर, मै अपना आत्मसम्मान गँवा बैठा

सेकुलरिज्म की टोपी की खातिर, मै अपनी पहचान गँवा बैठा !



समलैंगिक अधिकारो के लिए में घूमा मोमबत्ती और मशालें लिए -

चर्च गया, मस्जिद गया और फेसबुक चैक-इन कर के धर्मनिर्पेक्ष बना

लेकिन  बूढ़े माँ बाप को मंदिर कभी ले जाऊँ, वह संतान धर्म मै भुला बैठा 

सेकुलरिज्म की टोपी की खातिर, मै अपनी पहचान गँवा बैठा !



राजनीती के इस विकट खेल में, कभी वजीर बना कभी बना मै प्यादा

वह तो खान से गांधी बन गए और मै अपना खुद का भी नाम भुला बैठा

नानक और कबीर कभी सुने नहीं पर १००-१०० कलमे मै रट आया

२००२ को भूलने दिया कभी मैने पर एक और १९८४ करवा बैठा

सेकुलरिज्म की टोपी कि खातिर, मै अपनी पहचान गँवा बैठा !

~ Ratedstar

Wednesday, March 27, 2013

Meri Bhaang Wali Ice Cream !!! (Poem, 18+)

Masti mey ye rhyming ki hai hip hop style with naughty punches. Aap sabhi ko ek baar phir se Happy Holi!!! Just for fun...




Meri Bhaang Wali Ice Cream !!!!

Aetbaar karegi to jaanegi….
Labo se lagayegi to baat maanegi…
Dil bolega tring-tring….jo legi tu..
Meri Bhaang waali Ice Cream !!!!

Pila deta hai ye saaki bade auhdo tak ko paani….
Ek to fitting ka salwar-suit tera…
Aur doosra qatil tera dupatta Dhaani…
Ban jaa janeman mere naatiyon ki Nani…
Nikalva degi teri multiple Screams…
Meri Bhaang waali Ice Cream !!!!

Festive season ki chhut mujhe bhunani…
Point Blank range se apni pichkari hai chalani…
Free ki nahi hai ye Ice Cream…teri haath ki ghujiya hai khaani….
Itne nakhre sehat kharab kar denge meri Rani....
Kar degi tera har signal Green...
Meri Bhaang waali Ice Cream !!!!

Uncle nahi hai ghar pe…
Nashe mey apna ghar samajh ke abhi unhe aadhe ghante peeche ke gharo ki kundi hai khatkhatani...
Anyway, phir bhi chhupa di hai maine unki bandook Dunali…
Ab ye teri zimmedari hai…..tumhe sirf Aunty hai sulaani…
Kab samjhogi bada ho gaya hai….teri colony ka Chhota Bheem….le na..
Meri Bhaang waali Ice Cream !!!!

Gum ho jaayegi teri double chin…
Mera Intezaar karegi taare gin-gin…
Phir chahe jab bhi milegi…gaal par haath phira kar bolegi…”How have you been?”
Jamegi apni tagdi tag team…
Bhaang ki kick better than vodka-desi-rum ya jin….
Ghoomayegi muft mey tujhe London se Chin…
Charsi ho gaya tere pehlu ke bin…
Mat kar mera dil tod ke sin…
Jaldi muh mey le…arre, ab to pakad…pighalne lagi hai…
Meri Bhaang Waali Ice Cream !!!!

- Mohit Sharma (Trendy Baba)

Friday, January 25, 2013

Wo Koi Pir Raha Hoga...(Netaji Tribute)


A Tribute to Netaji Subash Chandra Bose 

ग़ुलामी के साये मे जो आज़ाद हिन्द की बातें करता था ...
किसी दौर मे खून के बदले जो आज़ादी का सौदा करता था ...
बचपन मे ही स्वराज के लिये अपनों से दूर हुआ होगा ...
बस अपनी सोच के गुनाह पर जो मुद्दतों जेल गया होगा ...
वो कोई पीर रहा होगा ....

क्या बरमा ...अंडमान  ..
क्या जर्मनी ...जापान ...
शायद ये जहाँ था उसके लिए छोटा ...
किसी दौर ने गोरो पर बंगाली जादू चढ़ते देखा होगा ..
फरिश्तो ने जिसका सजदा किया होगा ....
वो कोई पीर रहा होगा ....

अंदर सरपरस्त साधू .... बाहर पठान का चोगा ...
खुद की कैद को उसने अपनी रज़ा पर छोड़ा था ..
अंग्रेजो की आँखों का धोखा  ....
कहाँ ऐसा हिन्द का हमनवां होगा ..
वो कोई पीर रहा होगा ...

जहान को कुछ बताने ..रविन्द्र सी ग़ज़ल सुनाने ...
या शायद धूप-छाँव का हिसाब करने ज़मी पर यूँ ही आ गया ..
न उसके आने का हिसाब था ..और न जाने का ...
और कहने वाले कहते है वो 1945 के आसमां मे फ़ना हो गया ...
काश रूस पर सियासी बर्फ़ न जमा होती ...
अगर ये बात सच होती तो अनीता-एमिली की आँखों ने दगा दिया होगा ...
गाँधी से जीतकर भी जिसने महात्मा को जिया होगा ...
वो कोई पीर रहा होगा ...

वाकिफ जिंदगी मे जो कभी रुक न सका ....
गुमनामी मे दरिया पार किया होगा ...
दूर कहीं या पास यहीं कितनी मायूसी मे मुल्क को जीते-मरते देखा होगा ...
आज़ाद होकर अपने ज़हन से दूर हुआ होगा ...
 वो कोई पीर रहा होगा...


 वो कोई पीर रहा होगा...