Multilingual Previews, Reviews, Interviews & Point of Views...of/for/with/about various products, movies, books, people, things & events...
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Thursday, September 22, 2016
Friday, April 8, 2016
Friday, June 12, 2015
The ever-awesome Parshuram Sharma ji sings...
System-Malfunctioning fanboy moment when I met Parshuram Sharma ji....and he sang for me. :) Yay!
Legendary writer, actor, singer, music director Mr. Parshuram Sharma ji's original composition "Tumne Humko Thoda Thoda Pyaar...."
Labels:
Ghazal,
Hindi,
India,
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Mohit Sharma Trendster,
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Parshuram Sharma,
song
Location:
Meerut, Uttar Pradesh, India
Saturday, March 14, 2015
द रेसलिंग गेम रिव्यू - मोहित शर्मा (ज़हन)
द रेसलिंग गेम रिव्यू - मोहित शर्मा (ज़हन)
प्रो रेसलिंग से जुडी हर बात जैसे इस एक खेल मे समाहित कर दी गयी हों। ताकत, तकनीक, गति, स्टैमिना से लेकर स्टेज के पीछे की स्टोरीलाइंस, प्रतियोगितायें, हर स्टेज के टाइटल्स, टैग मैच, स्टेबल मैच जैसी विशेषताओं से भरा। जब आपका मन एक बात से ऊबे तब अनेको और फीचर्स आपको बांधे रखते है। हर कुछ समय में कुछ नयी बातें गेम में जोड़कर इसकी रोचकता और बढ़ा देते है। शायद यही कारण है जो मैं 2011 से लगातार यह ऑनलाइन गेम खेल हूँ। यह टेक्स्ट बेस्ड रणनीतिक, प्रबंधन आधारित खेल है, जिसका फ्लेवर धीरे-धीरे आप चढ़ता है। यहाँ निरंतरता की आवश्यकता नहीं है और आप स्वेच्छा से अपने अनुसार खेल में आगे बढ़ सकते है। कई सर्वर्स पर सक्रीय दुनिया भर के लाखो प्लेयर्स से आप अपनी तुलना कर सकते है। धीरे-धीरे खेल में ग्राफ़िक्स और एनिमेशन का समावेश किया जा रहा है आशा है आगे चलकर द रेसलिंग गेम और बेहतर एवम लोकप्रिय बनेगा।
The Wrestling Game, TWG is a game about every aspect of wrestling.
After naming your wrestler you get the chance to take him through his entire life time career, from an unknown 18 year old (default age) who couldn't pin a poster to a wall, to a hulking power house of a champion with legions of loyal fans.
By deciding what moves your wrestler learns and what sorts of skills he trains, you are able to give him a unique fighting style, and hopefully the tools he'll need to layeth the smacketh down upon his opponents, ---- and opponents he has in plenty, sinse tousands of other players are pumping up their wrestlers to.
With detailed match descriptions, a truly complex and technical fighting and skills system, and even the chance to create your wrestlers own custom moves (with their own mighty names and descriptions), join a stable with other wrestlers, and participate in matches ranin from tag team t cage match ups, this is absolutely the game for fans of any sort of wrestling at all.
sinse everything is standard text web pages, this is highly screen reader friendly, ---- you don't even have to cope with long columns of statistics. Also, all important choices have confirm/cancel text boxes pop up, which is great if you find yourself clicking the wrong button.
the game is also entirely free to play, however supporting the game with a donation will give a few bennifits, such as ability to train skills faster, and get some of the interesting match types and other options at lower levels, pluss try out any new game features earlier than those who haven't donated.
It's highly recommended you play through the in game tutorial when starting, and also check the forum found here sinse this is deffinately a deep and complex game, which requires more than a head full of muscles to win any championships.
#TWG #mohitness #mohit_trendster
Friday, February 20, 2015
भारतीय फिल्मों में सुधार की गुंजाईश - मोहित शर्मा (ज़हन)
भारतीय (खासकर बॉलीवुड़) और विदेशी फिल्मो की तुलना में अक्सर कई प्रशंषको की शिकायत होती है कि बिना सन्दर्भ, बजट को समझे बॉलीवुड की निंदा करना या उसे हॉलीवुड सरीखें उद्योगों से गुणवत्ता में कमतर बताना गलत है। तो पहले तो बता दूँ कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री से हर वर्ष कुछ बेहतरीन फिल्में निकलती है, जो दुनिया भर में सराही जाती है और विश्व की हर कसौटी पर खरी बैठती है, पर यह संख्या कुल निर्मित फिल्मो का बहुत छोटा हिस्सा है। बाकी मुख्यधारा या उन से इतर आयीं फिल्मो का स्तर साधारण / बेकार रह जाता है, खासकर कहानी-पटकथा के मामले में। बहाना यह मिलता है कि जनता का यही टेस्ट है, पर टेस्ट तो धीरे-धीरे बेहतर किया जा सकता है जिसकी कोई कोशिश नहीं की जाती। ऊपर से त्योहारो-छुट्टियों के समय अगर 1 बड़ी फिल्म दादागिरी से देश की 90-95 % सिनेमा स्क्रीन्स घेर लेगी तो दर्शकों के पास विकल्प ही कहाँ होगा कुछ और देखने का? इस से टेस्ट कैसे मापा जाये?
जैसे कथानक पर एक उदाहरण देता हूँ कहानी और दृश्यों पर। "चक दे इंडिया" (2007) में हर विपक्षी टीम की सिर्फ एक स्ट्रेटेजी थी। कोई एग्रेसिव खेल दिखाती टीम थी जो प्लेयर्स को चोट पहुँचा रही थी - टेकल कर रही थी, कोई टीम मैन टू मैन (प्लेयर टू प्लेयर) मार्किंग कर रही थी, इत्यादि। यह कोई हॉकी टूर्नामेंट ना होकर वीडियो गेम जैसी बात हो गयी, जिसमे हर स्टेज में कुछ फिक्स्ड बातें होती है। असल में एक स्ट्रेटेजी ना चले तो टीम्स के पास अनगिनत फोर्मेशंस और स्ट्रॅटजीज़ होती है जो वो तुरंत बदल भी सकती है। यह अंतर होता है मुख्यधारा बॉलीवुड और बाहर की फिल्मो में।
[बिंदिया नायक टू गुंजन - "फॉरवर्ड कन्याकुमारी, कन्याकुमारी....
"ऑपोसिशन प्लेयर - "थेम्स रिवर टू बरन्हेरी पैलेस... थेम्स रिवर टू बरन्हेरी पैलेस !!
"बिंदिया नायक - आंय ?????!!!!???] :p
इसके अलावा मुश्किल में एक मुस्लमान का अपमान करने वाला पूरा ज़माना बन गया, एक बड़ा तबका जो हमदर्दी और सहारा देता है उसको नहीं दिखाया गया। फिर कोच के प्लेयर्स के अगेंस्ट होने पर सब प्लेयर्स का साथ आ जाना, जब दुनिया इतनी ढीट है की कोच चाहे कैसा भी हो कई लोग चिपके रहेंगे उस से। ऐसे ही फिल्म में कई बातों को one dimensional दिखाया गया, मैं यह नहीं कह रहा की हर चीज़ टटोलो पर बाकी संभावनाओ की एक झलक तो दिखा दो। अंत में यह बताता चलूँ की मैं इस फिल्म को बेकार नहीं कह रहा, मैं कह रहा हूँ की और बेहतर हो सकती है ऐसी अच्छी फिल्मो में छोटी बातों का ध्यान रखा जाए अगर तो। :)
- मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster #trendster #trendy_baba #india #hindi
Wednesday, January 14, 2015
जानबूझ जानकार - मोहित शर्मा (ज़हन)
अनजाने में कुछ गलत बोल निकल जाते है कभी ना कभी हम सब से, पर वो फेक नहीं होता। पर कुछ लोग जान पहचान की आड़ में आदतन अक्सर दूसरो से बातों में ऑफेन्सिव, गलत बोलते है, मज़ाक उड़ाते है, मज़े या तफ़रीह लेते रहते है, अपनी गलती नहीं मानते और अपनी बात हमेशा ऊपर रखते है। मतलब वो दोस्त या जानने वाले भी बने रहेंगे और गलत भी कहते रहेंगे। अब हास्यास्पद बात तब होती है जब आप कभी कबार ऐसे लोगो से उनके अंदाज़ में मज़ाक करें, गलत बोलें या उनके स्टाइल में डिस्कशन करें। ऐसा होने पर ये लोग बिफर जाते है, अपसेट हो जाते है की उनके साथ आप ऐसा रुखा व्यवहार कैसे कर सकते है? (नोट कीजिये सिर्फ कभी कभी की बात में उनकी यह प्रतिक्रिया, जबकि उनका ऐसा बिहेवियर आम रहता है)
उनमे से कुछ को इस ट्रीटमेंट की बिलकुल आदत तक नहीं होती वो गुस्से में पूछते है "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुयी मुझसे ऐसा बर्ताव/बात करने की?" मतलब अपनी बारी में गिनती मत करो और दूसरा करे तो उसमे दशमलव अंको पर भी दहाड़ें मार कर रोओ। मैं काफी धैर्य से इस तरह के जानने वालो, दोस्तों को समझाता हूँ, पर एक लिमिट के बाद इनसे दूर हो जाता हूँ। रील लाइफ और ऑनलाइन ऐसे कुछ लोगो से पाला पड़ा है, उम्मीद है आगे कभी नहीं पड़े। रिलेशनशिप में भी कुछ पार्टनर्स अपने साथी से कई रोज़मर्रा की छोटी-बड़ी बातों में रूखे रहेंगे पर अगर उनका साथी वैसा करे तो सहन नहीं करेंगे। अगर पोस्ट की बात से जुड़ा कोई वाक्या (या व्यक्ति) हो तो ज़रूर शेयर करें कमेंट्स में।
Originally Posted on - चलते, चलते
Wednesday, November 26, 2014
Indian Comics Fandom Awards 2014 Final Tally
Indian Comics Fandom Awards 2014 Winners
*) - Best Blogger – Prashant Priyadarshi
*) - Best Cartoonist – Dheeraj ‘Dkboss’ Kumar
*) - Best Colorist – Ajay Thapa
*) - Best Reviewer – Neel Eeshu
*) - Best Comics Collector – Arun Prasad
*) - Best Fanfiction Writer – Karan Virk
*) - Best Fan Artist – Tadam Gyadu
Silver Positions (Runner-ups) – Indian Comics Fandom Awards 2014
*) - Blogger – Deven Pandey
*) - Cartoonist – Vineed Vijayan Ritchie
*) - Colorist – Jyoti Singh
*) - Reviewer – Mukesh Gupta
*) - Comics Collector – Abhinav Dutta
*) - Fanfiction Writer – Avijit Misra (Avi)
*) - Fan Artist – Amit Albert
Bronze Positions (Rank # 3) – Indian Comics Fandom Awards 2014
*) - Blogger – Anupam Agarwal
*) - Cartoonist – Soumendra Majumder
*) - Colorist – Mangesh Suryawanshi
*) - Reviewer – Rahul Kochar
*) - Comics Collector – Mehfooz Ali
*) - Fanfiction Writer – Frank Knot (Rahul Kumar)
*) - Fan Artist – Navneet Singh & Harish Atharv Thakur [Tie]
Indian Comics Fandom - Hall of Fame 2014
*) - Sanjay Singh
*) - Dheeraj Dkboss Kumar
*) - Mayank Sharma
*) - Arjun Mediratta
Nominations by from dozens of popular active-defunct communities, groups and discussion boards dedicated to Indian Comics. Annual Awards (first poll event - 2012), this year (2014) Total 262 nominations in 8 categories. 2013 winners of a category not included in the same category this year.
P.S. Don't forget to follow these Champions, Runner-ups and all other nominated awesome talents & checkout their profiles on various websites. Couple of Non-Poll categories results later this year.
#IndianComicsFandom #FreelanceTalents #ICFAwards
*) - Dheeraj Dkboss Kumar
*) - Mayank Sharma
*) - Arjun Mediratta
Nominations by from dozens of popular active-defunct communities, groups and discussion boards dedicated to Indian Comics. Annual Awards (first poll event - 2012), this year (2014) Total 262 nominations in 8 categories. 2013 winners of a category not included in the same category this year.
P.S. Don't forget to follow these Champions, Runner-ups and all other nominated awesome talents & checkout their profiles on various websites. Couple of Non-Poll categories results later this year.
#IndianComicsFandom #FreelanceTalents #ICFAwards
Saturday, October 18, 2014
Indian Fanfic Podcast Series by Mohit Trendster
*) - Complete Indian Fanfic Podcast Series Playlist (17:37
Minutes)
*) - Indian Fanfic Podcast (Part # 01)
*) - Indian Fanfic Podcast (Part # 02)
*) - Indian Fanfic Podcast (Part # 03)
*) - Indian Fanfic Podcast (Part # 04)
Wednesday, October 8, 2014
New Medal Tally Method - Mohitness
After every
multisport International event like Olympics, Commonwealth Games, Asian Games
etc I find the final medal tally listing a bit weird. Often, a nation winning many
medals ranks below than nations with fewer medals. The reason being only Gold
Medals are considered for overall ranking. So, if a nation wins 2 Gold medals
and a other nation wins 15 Silver or Bronze medals, first nation is ranked
better. Now, logic here is Gold is GOLD!! (Gold > Silver > Bronze)
My problem
is in such international events the difference between a Gold and Silver (and
Bronze) is few milliseconds, half point etc. Therefore, making 1 Gold medal
better than infinite Silver/Bronze medals or 1 Silver medal better than
infinite Bronze medals is just not done!
There should
be comparable chart for better overall performance based standings. Here’s a
suggestion – 1 >> 2 >> 3
ratio scheme. (1 Gold = 2 Silvers = 3 Bronzes), which means a Silver Medal
equals 1.50 Bronze Medals. If there is a tie we can give preference to better
medal.
Imagine in
an event a Japan wins 3 Golds, Fiji Wins 12 Bronzes, Turkmenistan wins 7
Silvers.
Traditionally, the tally stands –
1. Japan, 2. Turkmenistan, 3. Fiji
By adopting new approach tally changes
-
1.
Fiji, 2. Turkmenistan, 3. Japan
(4
>> 3.33 >> 3)
- Mohit Trendster
Tuesday, October 7, 2014
1000 Holds
List of 1000 Pro-Wrestling Holds.....from Airplane Spin to Wheelbarrow Suplex!
Origin: The list from like 14 years ago. It either came from www.otherarena.com which no longer exists (you can search for it in the Wayback Machine), a .txt file from the TNM7 wrestling simulator (you could choose different moves for the wrestlers so they had a text file to tell you what each move was) or it might have come from someone associated with tOA/CRZ's Slashdot websites. That's where I'd go for that. Heck it might have even been developed back during the Prodigy days and just constantly updated.
Tuesday, September 2, 2014
ढोंगी फिल्मकारों की जमात - मोहित शर्मा (ज़हन)
वैसे बात तो पहले भी देखी पर आप सबके लिए लिख आज रहा हूँ। इंटरनेट के ज़माने में कुछ ऐसी बातें देखने को मिल रही है जिनकी कम ही लोग कल्पना करते है। एक इंडिपेंडेंट 'फिल्मकार' के बारे में पता चला जो एक एक निजी शिक्षण संस्थान के प्रमुख भी है। उनकी अपडेट्स में अमेरिका, यूरोप आदि जगह की फिल्म प्रतियोगिताओ में उनकी शार्ट फिल्म्स को मिले सम्मानो का ज़िक्र था। मैं बहुत खुश हुआ की चलो कहीं तो कुछ हट कर काम करने वालो की पूछ हो रही है और कोई तो इन अवसरों का सही लाभ उठा रहा है। पर कुछ गड़बड़ तब लगी जब खबरों की पिक्स, अपनी फोटोज तो उन्होंने डाली पर कभी अपनी शार्ट फिल्म्स के लिंकस शेयर नहीं किये। उत्सुकता वश मैंने किसी तरह उनकी दो अवार्ड विनिंग फिल्म्स देखी।
एक तुलना कर रहा हूँ बचपन के अनुभव से 2 रुपये में एक नया चूरण ट्राई करने की सोची, चूरण खरीदकर स्कूल बस में चढ़ा (ध्यान दें की दुखद अनुभव की डिटेल्स कैसे याद रहती है हम सबको) फिर चूरण चखा। ऐसा लगा की चिड़िया की बीट किसी ने फ्राई करके सुखाई और उसका चूरण बना दिया, वो स्वाद आज भी याद है। ठीक वो स्वाद ताज़ा हो गया ज़ुबान पर जब मैंने इनकी शार्ट फिल्म्स देखी। ना कोई थीम, ना मेहनत, किसी नौसिखिये से भी बदतर काम। बड़ा दुख हुआ। तो सवाल यह की फिर ये जीतें कैसे वो भी 2-3 प्रतियोगितायें (और आगे भी जीतते रहेंगे)। पहले तो ये साफ़ कर दूँ की विदेशो में हुयी हर बात बड़ी नहीं होती। इनकी किसी प्रतियोगिता में 18 प्रविष्टियाँ आयीं किसी में 26, ऊपर से ऑनलाइन वोटिंग द्वारा निर्णय जिसमे इन्होने बोट्स यानी फेक प्रोफाइल्स से खुद को वोटिंग करवायी और मुश्किल से दूसरा, तीसरा स्थान प्राप्त किया। वहाँ से मिली इनामी राशि से इन्होने वो फेक वोटिंग की लागत निकाल ली।
बात यहाँ ख़त्म नहीं हुयी फिर लोकल मीडिया को बताया की जी "अंतर्राष्ट्रीय लेवल पर मेरी फिल्म जीती।" बाकी मीडिया का आप जानते ही है, कितनी फिल्म्स में जीती, क्या तीसरा स्थान आया या "जीती" कुछ वेरीफाई नहीं किया और बस रिपोर्टिंग कर दी। जो विदेशी लोग उत्सुकता में इनकी जीती हुयी फिल्म्स देखेगें तो उनपर भारत की क्या छवि पड़ेगी.... की ऐसी रद्दी प्रतिभायें भरी है इंडिया में? या इनकी अवार्ड विनिंग प्रोफाइल को देख कई लोग अच्छे-सच्चे कलाकारों का काम इनके अक्षम पर चमक-दमक वाले हाथो में दे देंगे। कई बूढ़े हो चुके प्रतिभा से धनि कलाकार तक कभी सम्मान नहीं पाते और ऐसे लोग अपने लिए सम्मान खरीद या बना लेते है। किसी चमकती चीज़ से आँखों में धुंधलका ना छाने दें। देखें-परखें-समझे…तब माने!
- मोहित शर्मा (ज़हन)
Monday, July 7, 2014
Last Train to Mahakali (1999) - Review : (मोहित शर्मा ट्रेंडी बाबा)
‘Last Train to Mahakali’, ek jhalak thi Anurag Kashyap ki
soch ki jo aane waale samay mey Indian Cinema ka rukh badalne waali thi. Yeh
unke dwara nirdeshit pehli film thi jiske liye budget to bahut kum tha hi saath
hi equipments bhi udhaar ke the. Camera udhaar tab mila jab Anurag ne apne ek dost ko film mey role ka vaayda kiya. Tab tak ek lekhak k roop mey Anurag ki
kuch pehchaan bani thi kyoki wo Ram Gopal Varma k liye kuch films ki scripts
likh chuke the aur tab unki likhi Satya ko khoob tareefen mil rahi thi.
Kismat se tab Star Plus channel naye writers aur directors
ko promote karti hui self contained short films ki ek series Star Bestsellers bana
raha tha. Anurag k concept ko Star team ne haatho haath liya aur unhe poori
chhut aur bada platform diya.
Film ki kahani ek journalist (Nivedita Bhattacharya) dwara sazayafta medical scientist (Kay Kay Menon) ki mulaqat se hoti hai jisko ek virus immunity
drug banane ka junoon tha aur is kaam mey wo safalta ke kareeb bhi aa gaya tha
par apne is kaam ki safalta k liye use apni banayi drug ka experiment insaano
par karna tha jiski ijazat uske institute AIIMS ne nahi di aur college chhod
kar wo alag prayog karne laga, is kram mey uske haatho kuch galtiyan aur apradh
hue, par aakhirkaar uski drug ko jab success mili to uska medical subject (ek pagal aurat) gayab
ho gaya aur wo kuch saabit nahi kar paaya. Ab journalist is Doctor ko insaaf
dilana chahti hai. Film ka ant ek alag andaz mey natkiye ghatnakram se hota hai.
Kay Kay Menon aur Nivedita ka abhinay kamaal ka hai. Menon sahab
k baare mey to waise ye kehne ki aadat ho gayi hai. Shayad isi kamaal ki
wajah se Anurag Kashyap brand k ek sthai ghatak ho gaye Menon ji. Waise ye love story nahi hai
par dono mainleads saath mey sehaj lagte hai (baad mey pata chala ki dono shaadishuda hai….he
he). Baaki kirdaaro (Vijay maurya, Luvleen Mishra, Shrivallabh Vyas) k paas
karne ko zyada kuch tha nahi par jitni bhi footage mili sabne prabhavit kiya. Film
ka ek khaas feature jiska shrey jaata hai Natarajan “Nutty” ko, uski
Cinematography, camera work hai jo darshak ko baandh kar rakhne mey aham
bhoomika nibhata hai.
Awards &
Recognition - Special Jury Award at the 8th Annual Star Screen Awards. In 2005,
the film was one of the four short films screened at an event organized by
Films Anonymous at Hyderabad.
421 Brand Beedi Rating
– 7.5/10 (Grade: B+)
- Mohit Trendster
Friday, June 27, 2014
लघु फिल्म समीक्षायें # 2 - मोहित शर्मा (ज़हन)
*) - हँसी तो फसी (2014)
हँसी तो फसी, नयी फिल्मों में से कुछ एक मे है जो कोशिश मुझे पसंद आयी। प्रेम कहानी मे किरदार है वो इसको थोड़ा हटकर बनाते है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और परिणीति चोपड़ा की परदे पर जोड़ी आकर्षक है। जहाँ सिद्धार्थ का किरदार सीधा सा है फिल्म की असल धुरी और जान है परिणीति का परिवर्तनशील किरदार। अदा शर्मा के पास करने को ज़्यादा कुछ था नहीं। हालाँकि, कहानी में काफी गुंजाईश थी जो पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पायी। संगीत कर्णप्रिय है। मेरे लिए हालिया समय की बेहतरीन फिल्मो मे से एक।
रेटिंग - 7.5/10
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*) - मैडागास्कर फिल्म सीरीज़ (2005, 2008, 2012)
एनीमेशन की तरफ हमेशा से मेरा रूझान रहा है पर अक्सर ऐसा होता था की जो बातें, कहानियाँ मुझे अच्छी लगती थी वो मेरे घरवालो, दोस्तों की पसंद नहीं बन पाती। फिर किस्मत से एक बार मैडागास्कर (2005) घरवालो के साथ देखी। इस बार यह सभी ने पसंद की। शेर एलेक्स से लेकर किंग जूलियन सब कुछ इतना दिलचस्प उसपर एक लाजवाब कहानी जिसमे अमरीकी चिड़ियाघर के 4 स्टार जानवर एक अंजानी जगह पहुँच जाते है। दूसरा भाग उतना रोचक नहीं था पर फिर भी मज़बूत नींव के दम पर कहानी में एलेक्स के अतीत के राज़ खुलते है। इस श्रृंखला की निकटतम कड़ी में चिड़ियाघर-जंगल के बाद सर्कस को लाया गया, जिसमे इन प्राणियों को देखकर आनंद बढ़ गया।
वैसे पहले भाग को अधिक रेट करूँगा पर अभी पूरी श्रृंखला को रेट करना हो तो 7/10 अंक।
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*) - हमशकल्स (2014)
साजिद खान एक समझदार इंसान और कलाकार है। यह उनके पुराने टीवी शोज़ देख कर आप अंदाज़ा लगा सकते है। फ़िल्मकार के रूप में वो सिर्फ पैसो को महत्व देते लगते है जिस वजह से पहले की तरह यहाँ उनकी प्रतिभा नहीं दिखती। दिखता है तो बेवकूफाना दृश्यों, संवादों और भ्रम में इधर उधर भागते किरदार। इसपर भी उनके कुछ फिक्स फंडे जैसे गे किरदार, अमीर खानदान, कन्फ्यूजन से बदली स्थिति, यहाँ तक की एक जैसे गाने (ट्रेडमार्क परोक्ष रूप से दर्शाया जाता है ना की इस तरह) आदि। वैसे फॉर अ चेंज पहले के प्रयासों से इस कहानी में थोड़ा दिमाग लगाया गया है जो लाज़मी है 3X3 ट्रिपल रोल के साथ। अभिनेत्रियों को भी अधिक फ़ुटेज देने में साजिद नाकाम रहते है। राम कपूर और सतीश शाह ने प्रशंषनीय काम किया है। संगीत औसत आया-गया रहेगा।
रेटिंग - 4.5/10
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यह साली ज़िन्दगी (2011)
2010 कई लोगो का सवाल था की फ्रेंच सरकार ने नाईटहुड की उपाधि क्यों दे दी सुधीर मिश्रा को। इनमे ज़्यादातर वो थे जिन्होंने सुधीर जी के लिखे बनाये सिनेमा को बस सुना, कभी देखा नहीं। दुर्भाग्य से इन लोगो की सँख्या बहुत अधिक है। बताते चलें की सुधीर जी को 3 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिल चुके है। यह साली ज़िन्दगी में एक नहीं बल्कि कई गूढ़ कथाएँ आपस में पिरोयी गयी है। समाज की नब्ज़ पकड़ बनायीं गयी फिल्म। अपराध, अपहरण, प्रेम, कुर्बानी की अनदेखी तस्वीरें पेश की गयी है। पर फिर जब सब कुछ सुधीर मिश्रा अंदाज़ में है तो तो त्रुटियाँ या कमियां भी उन्ही के स्टाइल वाली है यानी तेज़ रफ़्तार कहानी में किरदारों और कहानी के पहलुओं को ज़रुरत भर का भी ना समझाना। इरफ़ान खान, चित्रांगदा सिंह, प्रशांत, यशपाल कथानक में जान डाल देते है वहीँ अरुणोदय और अदिति एक बड़े हिस्से में व्यर्थ गये।
रेटिंग - 6.5/10
Thursday, June 26, 2014
लघु फिल्म समीक्षायें - मोहित शर्मा ज़हन
*) - फरेब (1996)
अनलॉफुल एंट्री (1992) पर आधारित विक्रम भट द्वारा निर्देशित यह कहानी नयी नहीं थी, इतने कम किरदारों के साथ रोमांच पैदा करने में फिल्म नाकाम रही। कलाकार फ़राज़ खान और सुमन रंगनाथन का फरेब मूवी से फिल्मो में पदार्पण हुआ। यह रिश्तों में दरार दिखाती, पारिवारिक-निजी कलह और त्रिकोण जैसी बातें लिये भट कैंप की ट्रेडमार्क फिल्म है। हालाँकि, अपने समय अनुसार बाद में आई फिल्मो का टोंड डाउन वर्सन है। मिलिंद गुणाजी यहाँ भी अभिनय में अग्रणी है। फिल्म का एक गाना "यह तेरी आँखें झुकी-झुकी, यह तेरा चेहरा खिला-खिला…" उस समय मशहूर हुआ था। संगीत से दर्शको को सिनेमा में खींचना भी भट कैंप की पुरानी आदत है। इसके अलावा अभिजीत का गाया "यार का मिलना...." मधुर है। फिल्म के बाद संगीत में जतिन-ललित ब्रांड मज़बूत हुआ।
रेटिंग - 4.5/10
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*) - इस रात की सुबह नहीं (1996)
सुधीर मिश्रा उन निर्देशकों में से है जिन्होंने अपनी अलग राह पकड़ी और भीड़ में पहचान बनायी। यह फिल्म मुंबई अपराध जगत को एक अलग कोण से दिखाती है। जहाँ 2 डॉन आमने सामने है और बीच में फँसा है एक प्रेमी युगल। उस दौर में इस विषय पर बहुत सी फिल्मे बनायीं गयी और "इस रात की सुबह नहीं" अपने ट्रीटमेंट और रफ़्तार के कारण जानी गयी। पर सुधीर जी एक कमी है की वह कहानी के सिरे खुले छोड़ देते फिर उन्हें आम जनता को समझाने कोशिश नहीं करते, ऐसी ही कुछ आदत मेरे लेखक मित्र श्री करण विर्क की है, जिस वजह से ऐसा बढ़िया काम भी कई लोग समझ नहीं पाते। अभिनय में निर्मल पाण्डेय, आशीष विध्यार्थी, सौरभ शुक्ला, तारा देशपांडे ने सराहनीय काम किया है। दुख है की तारा देशपांडे और निर्मल पाण्डेय को अधिक मौके नहीं मिल पाये। कुछ जगह दृश्यों बेहतर बजट से सुधारा जा सकता था। फिल्म से "चुप तुम रहो.." आज भी अक्सर रेडियो, टीवी पर सुनने को मिल जाता है।
रेटिंग - 6.5/10
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*) - फोर ब्रदर्स (2005)
4 गोद लिये हुए सौतेले भाइयों का साथ आकर अपनी माँ की हत्या का बदला लेना। बेसिक प्लाट काफी घिसा-पिटा लगता है, पर किरदारों की बनावट और अनेक यादगार दृश्यों के बल पर कभी-कभी फिल्म कहानी मोहताज़ नहीं रहती। कुछ ऐसा ही यहाँ जॉन सिंगलटन की फिल्म के साथ हुआ। फिल्म में रिश्तो गूढ़ता से बने ड्रामा और बदले भावना से बने एक्शन का ज़बरदस्त संगम है। कुछ कोण, दृश्य संवाद फिल्म की गुणवत्ता बढ़ा देते है। बॉबी यानी मार्क वॉलबर्ग का लुक और अभिनय सबसे बेहतर है।
रेटिंग - 7/10
Thursday, June 19, 2014
एक डॉक्टर की मौत (1991) फिल्म समीक्षा - मोहित शर्मा (ज़हन)
एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म। यह ईमानदार प्रयास प्रकाश डालता है भारतीय सरकारी प्रणाली और उसके मुलाज़िमों पर ना सिर्फ सुस्त, कामचोर, घूसखोर होते है बल्कि किसी सच्चे, मेहनती इंसान को भी आगे बढ़ता नहीं देखना चाहते चाहे इसमें दूसरो का भला ही क्यों ना छिपा हो। असल घटना तो लम्बी और दर्दनाक थी इसलिए इस रूपांतरण में कुछ बातें बदली गयी पर फिर भी फिल्म का संदेश साफ़ मिला।
कहानी एक डॉक्टर-वैज्ञानिक की है जो वर्षो तक कुष्ट रोग पर अनुसंधान करता है, अपनी निजी ज़िन्दगी और करियर को दांव पर लगा कर। इस धुन में सवार वो अपने करीबियों, खासकर अपनी पत्नी को बहुत तकलीफ पहुँचाता है पर वो उसका साथ निभाते है। डॉक्टर की मेहनत में कोई कमी नहीं थी पर काम का अगला कदम यानी व्यवस्था और उसके भ्रष्ट लोगो पर निर्भरता। इसमें दुखी डॉक्टर अपेक्षित व्यवहार नहीं करता और कई किताबी ज्ञान रखने वाले नाम के महकमे वालो को नाराज़ कर बैठता है। इस बीच डैमेज कंट्रोल और काउन्सलिंग की कोशिशें होती है, करीबी समझाते है पर सब बेकार। तो इस अदने डॉक्टर-वैज्ञानिक और सिस्टम के बीच किसकी जीत हुयी, इसके लिये फिल्म देखिये।
फिल्म का प्लाट तो बेहतरीन और अलग है ही पटकथा में तपन सिन्हा द्वारा की गयी मेहनत, रिसर्च साफ़ झलकती है। वैज्ञानिक भाषा, एक्सप्लेनेशन, बैकड्रॉप कमाल के है। थोड़ी कमी बस बजट में दिखी जो समानांतर सिनेमा में आम बात है। अभिनय के मामले में फिल्म के मुख्य किरदार पंकज कपूर डॉक्टर रॉय के किरदार में घुल गये है, उनकी कोई सीमा ही नहीं लगती और दर्शक के मन में अलग-अलग दृश्यों में वो किरदार अनुरूप क्या कर देंगे देखने की जिज्ञासा रहती है, ऐसा बहुत कम कलाकारों के साथ होता है। डॉक्टर रॉय की पत्नी की निरंतर शांत व्यथा तत्कालीन सिनेमा में शबाना आज़मी के अलावा शायद ही कोई निभा पाता। युवा पत्रकार बने इरफ़ान खान ने सीमित संवादों और दृश्यों के बावजूद भी दिल जीत लिया। विजयेंद्र घाटके के किरदार का उचित प्रयोग नहीं किया गया जैसा इस उम्दा अभिनेता के साथ अक्सर होता आया है। अब इनकी उम्र की वजह से इनका करियर भी सेमी-रिटायरमेंट में चला गया है, हालाँकि इनकी बेटी सागरिका घाटके अब बॉलीवुड में सक्रीय है। । दीपा साही को अपने मसाला किरदारों से अलग पर सीमित रोल मिला।
भारतीय परिवेश के इस पेचीदा विषय को समझाते हुए लिखी गयी पटकथा कुछ जगह मौलिक बात से हटती और टूटती सी लगती है जो स्वाभाविक बात है पर विषय की गहराई और मार्मिकता कम नहीं होती। फिल्म का ट्रीटमेंट आपको दूरदर्शन के स्वर्णिम युग की याद भी दिलवायेगा, इस फिल्म को मै 8/10 रेटिंग दूंगा।
421 Brand Beedi Grade - A (Rating 8/10)
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मोहित शर्मा ज़हन
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Meerut, Uttar Pradesh, India
Monday, May 19, 2014
द्रोहकाल (1994) फिल्म समीक्षा - मोहित शर्मा (ज़हन)
द्रोहकाल पुलिस के एक अलग तरह के संघर्ष से दर्शको का परिचय करवाती है। वैसे ऐसे विषयों को गोविंद जी तरजीह देते है और 1980 के दशक में आई इनकी फिल्म अर्धसत्य ने तहलका मचा दिया था, जिसको आज भी भारतीय सिनेमा की दिशा बदल कर रख देने वाली फिल्म के तौर पर याद किया जाता है। फिल्म पुलिस और उग्रवादियों की गुथमगुत्था की एक नयी दास्ताँ पेश करती है और उस समय के हिसाब से काफी आगे की फिल्म लगती है, जो बात गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित कई फिल्मो पर कही जा सकती है।
फिल्म का आगाज़ होता है अभय सिंह (ओम पुरी) और अब्बास लोधी (नसीरुद्दीन शाह) द्वारा ऑपेरशन धनुष के गठन से अंतर्गत एक प्रमुख उग्रवादी संगठन में 2 पुलिसिये मुखबिर आनंद (मनोज बाजपाई) और शिव (मिलिंद गुणाजी) को प्लांट करने से। उग्रवादियों की ताकत को कम आंकने की वजह से धीरे-धीरे उनकी मुश्किलें बढ़ती है जो उनके निजी जीवन को भी प्रभावित करने लगती है। आनंद कुछ वर्षो बाद उग्रवादियों द्वारा पकड़ लिया जाता है पर वो उन्हें कुछ पता चलने से पहले ही आत्महत्या कर लेता है जिस से शिव का राज़ बचा रहता है। शिव के प्रयासों से गुट का मुखिया भद्रा (आशीष विध्यार्थी) पकड़ा जाता है जिसके बावजूद पुलिस को विफलतायें मिलती रहती है। तब उग्रवादी गुट पुलिस स्पेशल सेल में सेंध लगाने की कोशिश करते है जो रहस्य और मानवीय विवशताओं का नया आइना दिखाती है।
द्रोहकाल के सबसे मज़बूत पक्ष है उसकी दमदार कास्टिंग और निर्देशन, कई दृश्यों को जीवंत सा करते कैमरा एंगल्स और सेट्स। फिल्म के केंद्र में है ओम पुरी (जो गोविंद की पसंद रहें है और अक्सर उनकी फिल्मो में दिखते है) जिनका अभिनय वास्तविक और किरदार अनुरूप है, उनके बाद मीता वशिष्ठ को काफी फुटेज मिली जिसको सार्थक किया उन्होंने , कहानी के मुख्य प्लाट से वो अलग रही पर अभय सिंह के निजी जीवन की झलकियों में वो ओम पुरी पर भारी दिखी। अंत में अन्नु कपूर के साथ उनका दृश्य रोंगटे खड़े वाला है। आशीष विध्यार्थी ने कमाल का नपा तुला काम किया है, कुछ जगह उनके संवाद मज़ा बढ़ा देते है। । नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, अन्नु कपूर प्रभावित करते है हालांकि मिलिंद गुणाजी ने थोड़ा निराश किया। गोविंद जी की ख़ास बात यह है की वो समानांतर और मुख्यधारा सिनेमा के बीच में सक्रीय रहकर किसी दक्ष शिल्पी की तरह ऐसी फिल्मो का निर्माण करते है जिसे दोनों तरह के दर्शक वर्ग देख-समझ सकते है और लुत्फ़ उठा सकते है। ऊपर से उनका करियर भी काफी लम्बा रहा जो अभी तक जारी है, वैसे देव (2004) के बाद उनकी कोई फिल्म नहीं आई है पर वो अभी भी सक्रीय है जो एक अच्छा संकेत है।
फिल्म के नकारात्मक पहलुओं में पहले तो कहानी में संघर्ष को और गहरा करते एंगल्स की कमी है खासकर जब विषय इतना संवेदनशील है। उग्रवाद से जुड़ा सब कुछ सीधी रेखा पर चलता सा दिखता है। एडिटिंग में भी कुछ जगह खामियां दिखती है। कुछ अदाकारों को और कैमरा टाइम दिया जा सकता था बिना फिल्म का समय बढ़ाये। ओवरआल अर्ध सत्य से तो तुलना करना बेमानी होगा पर फिर भी एक अच्छा प्रयास कहूँगा, द्रोहकाल को मैं 7/10 रेट करूँगा।
421 Brand Beedi Grade: B+
- मोहित शर्मा (ज़हन)
Sunday, May 4, 2014
किस्सा कुर्सी का (1978) फिल्म समीक्षा
"किस्सा कुर्सी का" (1978), नेट सर्फ़ करते हुए इस फिल्म के बारे में कुछ बेहद रोचक जानकारियाँ पता चली तो इसे देखने का मन बनाया। यह दुनिया की पहली ऐसी फिल्म है जो खुद का ही रीमेक है। हालाँकि यह एक काल्पनिक प्रयास बताया गया पर इसमें परोक्ष रूप से कुछ कटाक्ष थे भारतीय राजनीती एवम व्यवस्था पर तो 1976 में जब यह मूवी विपक्षी नेता अमृत नहाटा द्वारा बनाकर रिलीज़ को भेजी गयी, तत्कालीन सरकार को यह नागवार गुज़री और संजय गांधी ने देश भर से इस फिल्म के प्रिंट्स और मास्टरप्रिंट भी मुंबई से जबरन लेकर गुड़गांव स्थित मारुती की फैक्ट्री में रिलीज़ की तिथि से पहले जलवा दिये। तब यह पूरी फिल्म सिर्फ फिल्म से जुड़े कुछ लोगो ने और सेंसर बोर्ड के कुछ सदस्यों से देखी थी। मास्टर प्रिंट जल जाने की वजह से वो पहला प्रयास जिसमे ज़्यादा बजट और बेहतर कटाक्ष, कहानी थी वो दुनिया के सामने नहीं आ पायी। मुकदमा चला और दोषी संजय गांधी को कुछ हफ्तों की कैद हुयी।
कुछ समय बाद जनता पार्टी के सरकार आने के बाद अमृत नहाटा ने स्क्रिप्ट में थोड़े फेर-बदल किये ताकि इस बार बवाल और विरोध कम हो, जैसे - सीधे प्रहारों की जगह छद्म कटाक्ष, यह फिल्म थोड़े थिएटर स्टाइल की तरफ मोड़ी और इसका बजट और कलाकार कम किये। यानी यह कहा जा सकता है की पहले बनी फिल्म कई मायनो में बेहतर होगी। कहानी से पहले तब भारत की व्यवस्था बताता चलूँ की तब सोशलिस्ट व्यवस्था के अनुसरण में जनता और व्यापार के ऊपर सरकारी पाबंदियां, लाइसेंस राज था जिसमे सरकार की मुँहलगी कंपनीज़ को लाभ मिलता था और फैक्ट्रीज आदि लगाने का लाइसेंस हज़ारो में चुनिंदा को मिल पाता था। समाजवाद की आड़ लेकर पहले भी गिने चुने लोगो तक ही फायदा पहुँचता था। गलत नीतियों पर आवाज़ उठाने वाले रहस्यमय तरीके से गायब हो जाते थे या मर जाते थे।
कहानी में राजनीती के किंगमेकर्स मीरा (सुरेखा सिकरी, जी हाँ बालिका वधु की दादी सा) और गोपाल (राज किरण) सोची समझी चालो से एक मामूली सड़कछाप जमूरे गंगाराम उर्फ़ गंगू (मनोहर सिंह) को 'जन गण' देश का राष्ट्र प्रमुख बना देते है। फिर वो सब सत्ता के खेल में भोली भाली और गूँगी जनता (शबाना आज़मी) का तरह-तरह से शोषण करते है। कुर्सी बचाने के लिए जनता का ध्यान भटकाना, समय-समय पर परिस्थिति अनुसार रणनीति बदलना भी उनके काम में शामिल है। कहानी का अंत एक बड़ा संदेश दोहराता है की व्यक्ति के कर्म जैसे कालांतर में फल वैसे मिल ही जाते है।
फिल्म मे सबसे प्रभावशाली बात जो थी वह ये की काफी खूबी से कुछ तत्कालीन और भारतीय बहुत से राजनीती मे सदाबहार मुद्दो पर मीठी छुरी से वार किये गए है। समझदारी और तार्किक तरीके से हास्य में लिपटे इशारे किये है। अभिनय की बात करें तो फिल्म की कॉस्टिंग बड़ी सोच समझ कर की गयी होगी, सबसे पहले तो बिना एक शब्द बोले आँखों और भावो से शबाना आज़मी ने मार्मिक चित्रण किया है भोली जनता का, फिर चमन बग्गा जो प्रेजिडेंट गंगाराम के धूर्त सेक्रेटरी देशपाल बने है ने अपने किरदार में जान डाल दी, अफ़सोस है की चमन जी जैसी प्रतिभा 3-4 फिल्मो तक सीमित रह गयी। राज किरण, सुरेखा सिकरी और उत्पल दत ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया। फिल्म में तब विवादों में रहीं मॉडल, अदाकारा केटी मिर्ज़ा भी है।
यह फिल्म आर्ट-सामानांतर सिनेमा और व्यावसायिक सिनेमा का एक दुर्लभ एवम अच्छा मेल थी। दोबारा बनाये जाने, थोड़ी नीरस शुरुआत, स्क्रिप्ट में थोड़े बदलाव और पहले प्रयास से कम बजट की वजह से फिल्म में कुछ कमी लगती है पर फिर भी यह अपने मे एक पूर्ण और अपने समय से कहीं आगे की फिल्म लगती है। जिस वजह से मैं इस फिल्म को 8/10 रेटिंग देता हूँ और पढ़ने वालो से अपील करता हूँ की इसको ज़रूर देखें आपका समय व्यर्थ नहीं जायेगा।
421 Brand Beedi Grade - A (Rating: 8/10)
Mohit Sharma (Trendster / Trendy Baba)
Sunday, April 6, 2014
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