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Friday, February 20, 2015

भारतीय फिल्मों में सुधार की गुंजाईश - मोहित शर्मा (ज़हन)

भारतीय (खासकर बॉलीवुड़) और विदेशी फिल्मो की तुलना में अक्सर कई प्रशंषको की शिकायत होती है कि बिना सन्दर्भ, बजट को समझे बॉलीवुड की निंदा करना या उसे हॉलीवुड सरीखें  उद्योगों से गुणवत्ता में कमतर बताना गलत है। तो पहले तो बता दूँ कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री से हर वर्ष कुछ बेहतरीन फिल्में निकलती है, जो दुनिया भर में सराही जाती है और विश्व की हर कसौटी पर खरी बैठती है, पर यह संख्या कुल निर्मित फिल्मो का बहुत छोटा हिस्सा है। बाकी मुख्यधारा या उन से इतर आयीं फिल्मो का स्तर साधारण / बेकार रह जाता है, खासकर कहानी-पटकथा के मामले में। बहाना यह मिलता है कि जनता का यही टेस्ट है, पर टेस्ट तो धीरे-धीरे बेहतर किया जा सकता है जिसकी कोई कोशिश नहीं की जाती। ऊपर से त्योहारो-छुट्टियों के समय अगर 1 बड़ी फिल्म दादागिरी से देश की 90-95 % सिनेमा स्क्रीन्स घेर लेगी तो दर्शकों के पास विकल्प ही कहाँ होगा कुछ और देखने का? इस से टेस्ट कैसे मापा जाये?

जैसे कथानक पर एक उदाहरण देता हूँ कहानी और दृश्यों पर। "चक दे इंडिया" (2007) में हर विपक्षी टीम की सिर्फ एक स्ट्रेटेजी थी। कोई एग्रेसिव खेल दिखाती टीम थी जो प्लेयर्स को चोट पहुँचा रही थी - टेकल कर रही थी, कोई टीम मैन टू मैन (प्लेयर टू प्लेयर) मार्किंग कर रही थी, इत्यादि। यह कोई हॉकी टूर्नामेंट ना होकर वीडियो गेम जैसी बात हो गयी, जिसमे हर स्टेज में कुछ फिक्स्ड बातें होती है। असल में एक स्ट्रेटेजी ना चले तो टीम्स के पास अनगिनत फोर्मेशंस और स्ट्रॅटजीज़ होती है जो वो तुरंत बदल भी सकती है। यह अंतर होता है मुख्यधारा बॉलीवुड और बाहर की फिल्मो में।

[बिंदिया नायक टू गुंजन - "फॉरवर्ड कन्याकुमारी, कन्याकुमारी....
"ऑपोसिशन प्लेयर - "थेम्स रिवर टू बरन्हेरी पैलेस... थेम्स रिवर टू बरन्हेरी पैलेस !!
"बिंदिया नायक - आंय ?????!!!!???] :p

इसके अलावा मुश्किल में एक मुस्लमान का अपमान करने वाला पूरा ज़माना बन गया, एक बड़ा तबका जो हमदर्दी और सहारा देता है उसको नहीं दिखाया गया। फिर कोच के प्लेयर्स के अगेंस्ट होने पर सब प्लेयर्स का साथ आ जाना, जब दुनिया इतनी ढीट है की कोच चाहे कैसा भी हो कई लोग चिपके रहेंगे उस से। ऐसे ही फिल्म में कई बातों को one dimensional दिखाया गया, मैं यह नहीं कह रहा की हर चीज़ टटोलो पर बाकी संभावनाओ की एक झलक तो दिखा दो। अंत में यह बताता चलूँ की मैं इस फिल्म को बेकार नहीं कह रहा, मैं कह रहा हूँ की और बेहतर हो सकती है ऐसी अच्छी फिल्मो में छोटी बातों का ध्यान रखा जाए अगर तो। :)
- मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster #trendster #trendy_baba #india #hindi

Tuesday, September 2, 2014

ढोंगी फिल्मकारों की जमात - मोहित शर्मा (ज़हन)

  

वैसे बात तो पहले भी देखी पर आप सबके लिए लिख आज रहा हूँ। इंटरनेट के ज़माने में कुछ ऐसी बातें देखने को मिल रही है जिनकी कम ही लोग कल्पना करते है। एक इंडिपेंडेंट 'फिल्मकार' के बारे में पता चला जो एक एक निजी शिक्षण संस्थान के प्रमुख भी है। उनकी अपडेट्स में अमेरिका, यूरोप आदि जगह की फिल्म प्रतियोगिताओ में उनकी शार्ट फिल्म्स को मिले सम्मानो का ज़िक्र था। मैं बहुत खुश हुआ की चलो कहीं तो कुछ हट कर काम करने वालो की पूछ हो रही है और कोई तो इन अवसरों का सही लाभ उठा रहा है। पर कुछ गड़बड़ तब लगी जब खबरों की पिक्स, अपनी फोटोज तो उन्होंने डाली पर कभी अपनी शार्ट फिल्म्स के लिंकस शेयर नहीं किये। उत्सुकता वश मैंने किसी तरह उनकी दो अवार्ड विनिंग फिल्म्स देखी। 

एक तुलना कर रहा हूँ बचपन के अनुभव से 2 रुपये में एक नया चूरण ट्राई करने की सोची, चूरण खरीदकर स्कूल बस में चढ़ा (ध्यान दें की दुखद अनुभव की डिटेल्स कैसे याद रहती है हम सबको) फिर चूरण चखा। ऐसा लगा की चिड़िया की बीट किसी ने फ्राई करके सुखाई और उसका चूरण बना दिया, वो स्वाद आज भी याद है। ठीक वो स्वाद ताज़ा हो गया ज़ुबान पर जब मैंने इनकी शार्ट फिल्म्स देखी। ना कोई थीम, ना मेहनत, किसी नौसिखिये से भी बदतर काम। बड़ा दुख हुआ। तो सवाल यह की फिर ये जीतें कैसे वो भी 2-3 प्रतियोगितायें (और आगे भी जीतते रहेंगे)। पहले तो ये साफ़ कर दूँ की विदेशो में हुयी हर बात बड़ी नहीं होती। इनकी किसी प्रतियोगिता में 18 प्रविष्टियाँ आयीं किसी में 26, ऊपर से ऑनलाइन वोटिंग द्वारा निर्णय जिसमे इन्होने बोट्स यानी फेक प्रोफाइल्स से खुद को  वोटिंग करवायी और मुश्किल से दूसरा, तीसरा स्थान प्राप्त किया। वहाँ से मिली इनामी राशि से इन्होने वो फेक वोटिंग की लागत निकाल ली। 

बात यहाँ ख़त्म नहीं हुयी फिर लोकल मीडिया को बताया की जी "अंतर्राष्ट्रीय लेवल पर मेरी फिल्म जीती।"  बाकी मीडिया का आप जानते ही है, कितनी फिल्म्स में जीती, क्या तीसरा स्थान आया या "जीती" कुछ वेरीफाई नहीं किया और बस रिपोर्टिंग कर दी। जो विदेशी लोग उत्सुकता में इनकी जीती हुयी फिल्म्स देखेगें तो उनपर भारत की क्या छवि पड़ेगी.... की ऐसी रद्दी प्रतिभायें भरी है इंडिया में? या इनकी अवार्ड विनिंग प्रोफाइल को देख कई लोग अच्छे-सच्चे कलाकारों का काम इनके अक्षम पर चमक-दमक वाले हाथो में दे देंगे। कई बूढ़े हो चुके प्रतिभा से धनि कलाकार तक कभी सम्मान नहीं पाते और ऐसे लोग अपने लिए सम्मान खरीद या बना लेते है। किसी चमकती चीज़ से आँखों में धुंधलका ना छाने दें। देखें-परखें-समझे…तब माने! 

- मोहित शर्मा (ज़हन)

Friday, June 27, 2014

लघु फिल्म समीक्षायें # 2 - मोहित शर्मा (ज़हन)

*) - हँसी तो फसी (2014)



हँसी तो फसी, नयी फिल्मों में से कुछ एक मे है जो कोशिश मुझे पसंद आयी। प्रेम कहानी मे किरदार है वो इसको थोड़ा हटकर बनाते है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और परिणीति चोपड़ा की परदे पर जोड़ी आकर्षक है। जहाँ सिद्धार्थ का किरदार सीधा सा है फिल्म की असल धुरी और जान है परिणीति का परिवर्तनशील किरदार। अदा शर्मा के पास करने को ज़्यादा कुछ था नहीं। हालाँकि, कहानी में काफी गुंजाईश थी जो पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पायी। संगीत कर्णप्रिय है। मेरे लिए हालिया समय की बेहतरीन फिल्मो मे से एक। 

रेटिंग - 7.5/10 
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*) - मैडागास्कर फिल्म सीरीज़ (2005, 2008, 2012)



एनीमेशन की तरफ हमेशा से मेरा रूझान रहा है पर अक्सर ऐसा होता था की जो बातें, कहानियाँ मुझे अच्छी लगती थी वो मेरे घरवालो, दोस्तों की पसंद नहीं बन पाती। फिर किस्मत से एक बार मैडागास्कर (2005) घरवालो के साथ देखी। इस बार यह सभी ने पसंद की। शेर एलेक्स से लेकर किंग जूलियन सब कुछ इतना दिलचस्प उसपर एक लाजवाब कहानी जिसमे अमरीकी चिड़ियाघर के 4 स्टार जानवर एक अंजानी जगह पहुँच जाते है। दूसरा भाग उतना रोचक नहीं था पर फिर भी मज़बूत नींव के दम पर कहानी में एलेक्स के अतीत के राज़ खुलते है। इस श्रृंखला की निकटतम कड़ी में चिड़ियाघर-जंगल के बाद सर्कस को लाया गया, जिसमे इन प्राणियों को देखकर आनंद बढ़ गया। 

वैसे पहले भाग को अधिक रेट करूँगा पर अभी पूरी श्रृंखला को रेट करना हो तो 7/10 अंक। 
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*) - हमशकल्स (2014)



साजिद खान एक समझदार इंसान और कलाकार है। यह उनके पुराने टीवी शोज़ देख कर आप अंदाज़ा लगा सकते है। फ़िल्मकार के रूप में वो सिर्फ पैसो को महत्व देते लगते है जिस वजह से पहले की तरह यहाँ उनकी प्रतिभा नहीं दिखती। दिखता है तो बेवकूफाना दृश्यों, संवादों और भ्रम में इधर उधर भागते किरदार। इसपर भी उनके कुछ फिक्स फंडे जैसे गे किरदार, अमीर खानदान, कन्फ्यूजन से बदली स्थिति, यहाँ तक की एक जैसे गाने (ट्रेडमार्क परोक्ष रूप से दर्शाया जाता है ना की इस तरह) आदि। वैसे फॉर अ चेंज पहले के प्रयासों से इस कहानी में थोड़ा दिमाग लगाया गया है जो लाज़मी है 3X3 ट्रिपल रोल के साथ। अभिनेत्रियों को भी अधिक फ़ुटेज देने में साजिद नाकाम रहते है। राम कपूर और सतीश शाह ने प्रशंषनीय काम किया है। संगीत औसत आया-गया रहेगा। 

रेटिंग - 4.5/10 
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यह साली ज़िन्दगी (2011)



2010 कई लोगो का सवाल था की फ्रेंच सरकार ने नाईटहुड की उपाधि क्यों दे दी सुधीर मिश्रा को। इनमे ज़्यादातर वो थे जिन्होंने सुधीर जी के लिखे बनाये सिनेमा को बस सुना, कभी देखा नहीं। दुर्भाग्य से इन लोगो की सँख्या बहुत अधिक है। बताते चलें की सुधीर जी को 3 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिल चुके है। यह साली ज़िन्दगी में एक नहीं बल्कि कई गूढ़ कथाएँ आपस में पिरोयी गयी है। समाज की नब्ज़ पकड़ बनायीं गयी फिल्म। अपराध, अपहरण, प्रेम, कुर्बानी की अनदेखी तस्वीरें पेश की गयी है। पर फिर जब सब कुछ सुधीर मिश्रा अंदाज़ में है तो तो त्रुटियाँ या कमियां भी उन्ही के स्टाइल वाली है यानी तेज़ रफ़्तार कहानी में किरदारों और कहानी के पहलुओं को ज़रुरत भर का भी ना समझाना। इरफ़ान खान, चित्रांगदा सिंह, प्रशांत, यशपाल कथानक में जान डाल देते है वहीँ अरुणोदय और अदिति एक बड़े हिस्से में व्यर्थ गये। 

रेटिंग - 6.5/10 

Thursday, June 26, 2014

लघु फिल्म समीक्षायें - मोहित शर्मा ज़हन

*) - फरेब (1996)



अनलॉफुल एंट्री (1992) पर आधारित विक्रम भट द्वारा निर्देशित यह कहानी नयी नहीं थी, इतने कम किरदारों के साथ रोमांच पैदा करने में फिल्म नाकाम रही। कलाकार फ़राज़ खान और सुमन रंगनाथन का फरेब मूवी से फिल्मो में पदार्पण हुआ। यह रिश्तों में दरार दिखाती, पारिवारिक-निजी कलह और त्रिकोण जैसी बातें लिये भट कैंप की ट्रेडमार्क फिल्म है। हालाँकि, अपने समय अनुसार बाद में आई फिल्मो का टोंड डाउन वर्सन है। मिलिंद गुणाजी यहाँ भी अभिनय में अग्रणी है। फिल्म का एक गाना "यह तेरी आँखें झुकी-झुकी, यह तेरा चेहरा खिला-खिला…" उस समय  मशहूर हुआ था। संगीत से दर्शको को सिनेमा में खींचना भी भट कैंप की पुरानी आदत है। इसके अलावा अभिजीत का गाया "यार का मिलना...." मधुर है। फिल्म के बाद संगीत में जतिन-ललित ब्रांड मज़बूत हुआ।

रेटिंग - 4.5/10  

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*) - इस रात की सुबह नहीं (1996)



सुधीर मिश्रा उन निर्देशकों में से है जिन्होंने अपनी अलग राह पकड़ी और भीड़ में पहचान बनायी। यह फिल्म मुंबई अपराध जगत को एक अलग कोण से दिखाती है। जहाँ 2 डॉन आमने सामने है और बीच में फँसा है एक प्रेमी युगल। उस दौर में इस विषय पर बहुत सी फिल्मे बनायीं गयी और  "इस रात की सुबह नहीं" अपने ट्रीटमेंट और रफ़्तार के कारण जानी गयी। पर सुधीर जी एक कमी है की वह कहानी के सिरे खुले छोड़ देते फिर उन्हें आम जनता को समझाने कोशिश नहीं करते, ऐसी ही कुछ आदत मेरे लेखक मित्र श्री करण विर्क की है, जिस वजह से ऐसा बढ़िया काम भी कई लोग समझ नहीं पाते। अभिनय में निर्मल पाण्डेय, आशीष विध्यार्थी, सौरभ शुक्ला, तारा देशपांडे ने सराहनीय काम किया है। दुख है की तारा देशपांडे और निर्मल पाण्डेय को अधिक मौके नहीं मिल पाये। कुछ जगह दृश्यों बेहतर बजट से सुधारा  जा सकता था। फिल्म से "चुप तुम रहो.." आज भी अक्सर रेडियो, टीवी पर सुनने को मिल जाता है। 

रेटिंग - 6.5/10 

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*) - फोर ब्रदर्स (2005)



4 गोद लिये हुए सौतेले भाइयों का साथ आकर अपनी माँ की हत्या का बदला लेना। बेसिक प्लाट काफी घिसा-पिटा लगता है,  पर किरदारों की बनावट और अनेक यादगार दृश्यों के बल पर कभी-कभी फिल्म कहानी मोहताज़ नहीं रहती। कुछ ऐसा ही यहाँ जॉन सिंगलटन की फिल्म के साथ हुआ। फिल्म में रिश्तो गूढ़ता से बने ड्रामा और बदले भावना से बने एक्शन का ज़बरदस्त संगम है। कुछ कोण, दृश्य  संवाद फिल्म की गुणवत्ता बढ़ा देते है। बॉबी यानी मार्क वॉलबर्ग का लुक और अभिनय सबसे बेहतर है। 

रेटिंग - 7/10 

Sunday, May 4, 2014

किस्सा कुर्सी का (1978) फिल्म समीक्षा


"किस्सा कुर्सी का" (1978), नेट सर्फ़ करते हुए इस फिल्म के बारे में कुछ बेहद रोचक जानकारियाँ पता चली तो इसे देखने का मन बनाया। यह दुनिया की पहली ऐसी फिल्म है जो खुद का ही रीमेक है। हालाँकि यह एक काल्पनिक प्रयास बताया गया पर इसमें परोक्ष रूप से कुछ कटाक्ष थे भारतीय राजनीती एवम व्यवस्था पर तो 1976 में जब यह मूवी विपक्षी नेता अमृत नहाटा द्वारा बनाकर रिलीज़ को भेजी गयी, तत्कालीन सरकार को यह नागवार गुज़री और संजय गांधी ने देश भर से इस फिल्म के प्रिंट्स और मास्टरप्रिंट भी मुंबई से जबरन लेकर गुड़गांव स्थित मारुती की फैक्ट्री में रिलीज़ की तिथि से पहले जलवा दिये। तब यह पूरी फिल्म सिर्फ फिल्म से जुड़े कुछ लोगो ने और सेंसर बोर्ड के कुछ सदस्यों से देखी थी। मास्टर प्रिंट जल जाने की वजह से वो पहला प्रयास जिसमे ज़्यादा बजट और बेहतर कटाक्ष, कहानी थी वो दुनिया के सामने नहीं आ पायी। मुकदमा चला और दोषी संजय गांधी को कुछ हफ्तों की कैद हुयी। 

कुछ समय बाद जनता पार्टी के सरकार आने के बाद अमृत नहाटा ने स्क्रिप्ट में थोड़े फेर-बदल किये ताकि इस बार बवाल और विरोध कम हो, जैसे - सीधे प्रहारों की जगह छद्म कटाक्ष, यह फिल्म थोड़े थिएटर स्टाइल की तरफ मोड़ी और इसका बजट और कलाकार कम किये। यानी यह कहा जा सकता है की पहले बनी फिल्म कई मायनो में बेहतर होगी। कहानी से पहले तब भारत की व्यवस्था बताता चलूँ की तब सोशलिस्ट व्यवस्था के अनुसरण में जनता और व्यापार के ऊपर सरकारी पाबंदियां, लाइसेंस राज था जिसमे सरकार की मुँहलगी कंपनीज़ को लाभ मिलता था और फैक्ट्रीज आदि लगाने का लाइसेंस हज़ारो में चुनिंदा को मिल पाता था। समाजवाद की आड़ लेकर पहले भी गिने चुने लोगो तक ही फायदा पहुँचता था। गलत नीतियों पर आवाज़ उठाने वाले रहस्यमय तरीके से गायब हो जाते थे या मर जाते थे। 

कहानी में राजनीती के किंगमेकर्स मीरा (सुरेखा सिकरी, जी हाँ बालिका वधु की दादी सा) और गोपाल (राज किरण) सोची समझी चालो से एक मामूली सड़कछाप जमूरे गंगाराम उर्फ़ गंगू (मनोहर सिंह) को 'जन गण' देश का राष्ट्र प्रमुख बना देते है। फिर वो सब सत्ता के खेल में भोली भाली और गूँगी जनता (शबाना आज़मी) का तरह-तरह से शोषण करते है। कुर्सी बचाने के लिए जनता का ध्यान भटकाना, समय-समय पर परिस्थिति अनुसार रणनीति बदलना भी उनके काम में शामिल है। कहानी का अंत एक बड़ा संदेश दोहराता है की व्यक्ति के कर्म जैसे कालांतर में फल वैसे मिल ही जाते है। 


फिल्म मे सबसे प्रभावशाली बात जो थी वह ये की काफी खूबी से कुछ तत्कालीन और भारतीय बहुत से राजनीती मे सदाबहार मुद्दो पर मीठी छुरी से वार किये गए है। समझदारी और तार्किक तरीके से हास्य में लिपटे इशारे किये है। अभिनय की बात करें तो फिल्म की कॉस्टिंग बड़ी सोच समझ कर की गयी होगी, सबसे पहले तो बिना एक शब्द बोले आँखों और भावो से शबाना आज़मी ने मार्मिक चित्रण किया है भोली जनता का, फिर चमन बग्गा जो  प्रेजिडेंट गंगाराम के धूर्त सेक्रेटरी देशपाल बने है ने अपने किरदार में जान डाल दी, अफ़सोस है की चमन जी जैसी प्रतिभा 3-4 फिल्मो तक सीमित रह गयी। राज किरण, सुरेखा सिकरी और त्पल दत ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया। फिल्म में तब विवादों में रहीं मॉडल, अदाकारा केटी मिर्ज़ा भी है। 

यह फिल्म आर्ट-सामानांतर सिनेमा और व्यावसायिक सिनेमा का एक दुर्लभ एवम अच्छा मेल थी। दोबारा बनाये जाने, थोड़ी नीरस शुरुआत, स्क्रिप्ट में थोड़े बदलाव और पहले प्रयास से कम बजट की वजह से फिल्म में कुछ कमी लगती है पर फिर भी यह अपने मे एक पूर्ण और अपने समय से कहीं आगे की फिल्म लगती है। जिस वजह से मैं इस फिल्म को 8/10 रेटिंग देता हूँ और पढ़ने वालो से अपील करता हूँ की इसको ज़रूर देखें आपका समय व्यर्थ  नहीं जायेगा। 

421 Brand Beedi Grade - A (Rating: 8/10)



Mohit Sharma (Trendster / Trendy Baba)

Saturday, March 1, 2014

आपको कला का वास्ता...Mohitness

Pic Pichhle Mahine li....posts mey thumnail k vaaste :p

अभी हाल में आयी इम्तियाज़ अली कि फ़िल्म 'हाईवे' को मिलती प्रशंषा देख रहा हूँ। आज इस पर ही कुछ लिखना चाहता हूँ, अक्सर लोगो को किसी फिल्मकार, कलाकार को पूजते, अपना आदर्श मानते देखता हूँ तो अच्छा लगता है कि कला कि कद्र करने वाले कितने लोग है। 

पर इंटरनेट के इस ज़माने में अंधभक्ति मुझे बिलकुल समझ नहीं आती। ज्यादा समय न लेते हुए बता दूँ कि हाईवे, २० साल पहले आयी एक हॉलीवुड पिक्चर "द चेज़" से लगभग पूरी तरह उठायी गयी है - दृश्य, किरदार यहाँ तक कि घटनाओं का क्रम एवम परिस्थितियाँ और ऐसा पहली बार नहीं है इनके द्वारा - "जब वी मेट (2007)', 1995 में आयी फ़िल्म "ए वाक इन द क्लाउड्स' कि चोरी थी, 'लव आज कल (2009)' - थ्री टाइम्स, 'रॉकस्टार (2011)' - द डोर्स (1991)...बाकी बची इनकी 2-3  फिल्मे मैंने  देखी नहीं पर आप इंटरनेट सर्च कर सकते है और जवाब खुद मिल जायेंगे आपको। मेरी या नेट पर किसी कि बात ठीक ना लगे तो खुद यह फिल्म्स देखें और निर्णय लें।

एक होता है अपने अनुसार प्रयोग कर कुछ नया करना (जो बहुत कम होता है पर होता है), एक होता है रीमेक के अधिकार लेकर फ़िल्म बनाना, एक होता है कि किसी आईडिया से प्रेरित हो उस तरह का कुछ पर फिर भी अपने इनपुट्स से काफी अलग फ़िल्म बनाना और एक बेशर्म कॉपी जिसमें नाम के लिए कुछ सीन अलग रहें ताकि रीमेक के अधिकार का जो कुछ प्रतिशत असल मूवी बनाने वालों को देना पड़ता वो भी बच जाए...उल्टा देखने को मिलता है कि ऐसे व्यक्तियों को सबसे ज्यादा नाम, सराहना और पुरस्कार मिलते है। इम्तियाज़ अली या उन जैसे और निर्देशको को आप किस श्रेणी में रखते है यह आप पर छोड़ता हूँ।

मेरा निवेदन है -

*) - आपको मनोरंजन चाहिये, लीजिये - ऐसे व्यापारियों को पैसा दीजिये ठीक! कोई दिक्कत नहीं, क्योकि इनकी यूनिट में कई लोग होते है जिन्हे ये काम देते है - बाकी फ़िल्म कि वजह से देश भर मे वितरकों से लेकर पॉपकॉर्न मशीन वाले तक कमर्शियल मूवीज़ कि जनता पर निर्भर है। 

*) - पर दिक्कत मुझे तब होती है जब आप इन व्यापारियों को दूरदर्शी कलाकार, समाजसेवी  कहकर इन्हे इज्जत देते है, पूजते है-अपना आदर्श मानते है। रिसर्च कीजिये (जो इतनी मुश्किल नहीं है, नेट पर कुछ क्लिक्स काफी है)।

*) - कई फ़िल्मकार, कलाकार मूलभूत मुद्दो, नए मुद्दों पर फिल्मे बनाते है जिनका इतना प्रचार नहीं होता पर आप अगर मध्यम वर्ग से है और थोड़े पैसे खर्च कर सकते है तो वो फिल्मे आप देख सकते है। ऐसी फिल्मो को भी  बढ़ावा दें, ऐसे कलाकारों पर भी अपना पैसा लगायें। ताकि इनकी संख्या और नाम भी बढे!

हाईवे मे काफी सम्भावनायें थी उसकी दिशा अगर पहले से जाँची परखी राह पर ना जाकर अपने इनपुट्स से कि तय कि जाती, इसमें एक सामाजिक पहलु है जिसकी मैं सराहना करता हूँ पर वहाँ भी इतना स्कोप होते हुए भी बस उसको छू भर लिया गया। पर मैं पूरा निश्चिन्त हूँ कि इस मूवी को अधूरा बताने वालों को या निर्देशक निंदा करने वालो को कई लोग छोटी मानसिकता वाला करार दे देंगे। 

Sunday, November 10, 2013

Sehar (Movie Review)



Kal Sehar movie dekhi jo 1990s mey Uttar Pradesh k kukhyat Gangster Shri Prakash Shukla jiske naam kai murders, kidnappings thi....(izzat nahi de raha hun uska naam hi Shri Prakash tha) aur tab form huyi Special Task Force (STF) par based thi. Mai rarely ek movie ek se zyada baar dekh pata hun par Sehar jab bhi TV par aayi hai (3-4 times) maine dekhi. Achchhi movie to hai hi par shayad isliye bhi kyoki isme Lucknow shehar ki locations aur unke reference kai baar aate hai just like "Main, Meri Patni aur Woh" & "Tanu Weds Manu". 

Tab cell phone naye the aur Police k liye apradhiyon ka surveillance ek nayi baat. Technology mey Police gangsters k naye tareeko se pichhad rahi thi tab STF ka gathan hua jinka saath diya ek expert professor ne. Script-Dialogues par itni mehnat bahut kum dekhne ko milti hai technical jargon ko tareeke se samjhaya gaya hai. Arshad Warsi (SSP Ajay Kumar) aur Mahima Chaudhary ka love angle hai, traumatized past angle hai Arshad k pita se juda....Politics, thrill, shootouts ka achchha mix hai. Itni bhaag daud k baad climax to bas kayamat scene hai....usi scene mey,

STF team k Saiyyad ko goli lag jaati hai aur SP Ajay apne saathi k saath gangster k peeche jaate hai Prof. Tiwari (Pankaj Kapur) jinhe khoon kharabe aur bandooko se bada darr lagta hai ko Saiyyad k paas chhod kar. Saiyyad mar jata hai to Prof. Tiwari Ajay Kumar k peeche jaate hai.

Arshad Warsi - "Tiwari ji, aap yahan kya kar rahe hai aapko to Saiyyad k paas hona chahiye."

Uske baad ka moment, expressions hai wo batayen nahi jaa sakte.

Acting mey Pankaj Kapur, Arshad Warsi, Suhasini Mulay, Mahima Chaudhary, Sushant Singh ne zabardast kaam kiya hai. Director Kabeer Kaushik ka aese unche level ka debut Bollywood mey rarity hai.

421 Brand Beedi Rating - 8/10

Beautiful Song "Sapno ka Shehar ho" from the movie (promotional & background)


Sunday, September 22, 2013

Interview : Courtney Dowdy (Actress-Model)

An interview with beautiful (& talented) actress Courtney Dowdy from Kentucky, United States. Enjoy! Like-subscribe-follow her profiles...

P.S. Interviewer - Yours Truly :)

Interview (Q & A) Video (Unable to attach the video on Blog) :



Courtney as Maddie (Movie : Fat Chance)

Questions sent to Courtney

"Question 1) - Who/What inspired you to become an actress & how old were you when you started acting, were you involved in musicals and plays in school?

Question 2) - Who are your Role Models or people you look up to in Acting, Modeling & Life (and Why)?

Question 3) - What is/are your favorite movie genre(s)?

Question 4) - Other Hobbies and Pastimes besides acting, modeling?

Question 5) - Tell us more about your upcoming projects?

Question 6) - Where do you see yourself 10 years from now?

Question 7) - What advice would you give to young kids who want to act?

Question 8) - Your best performance till date? (& your best youtube monologue video also)

Question 9) - Share some interesting items from your ‘Bucketlist’ & few random facts about yourself?



10) – This is a request; I liked all your monologue videos & want to see you reading my funny poem in a serious/tragic monologue mode.

Title – Just ‘Hear’ This!!
"There was a Deer,
Whose ear sensed a Bear,
Deer froze with fear,
Bear came near.

Negotiated Deer,
"Dear Bear, I have Beer, with which you can cheer."
Bear changed his mind's gear,
Bear drank beer.
and also tried to tear the deer,
Escaped Deer,
By reminding Bear,
That Bear forgot to wear his underwear."

Best Wishes!
Mohit Sharma"



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- Mohit Sharma (Trendster / Trendy Baba)

Friday, September 13, 2013

Satyagraha Movie Review

Satyagraha Movie Review



Movie dekh to li thi 10-12 din pehle Review late de raha hun...

Prakash Jha ki as a Director log bahut taareef karte hai ya izzat karte hai. Ab pata nahi aap log maanenge ya nahi is izzat ka ek bada hissa is wajah se kyoki wo serious-social issues chunte hai...arre sachchi...personal experience hai mujhe to, kai baar sambodhano mey Mohit Sir se Mohit ji....Mohit Bhai k baad Mohit tak pahuncha hun jaise jaise logo ne serious se shuru kar baaki genres ki cheezen padhi meri. Jokes apart unke career par gaur karen to usme satta, rajneeti k sangarsh aur parde k peeche k khel, antardwand par zor rehta hai.

Ab bhi unhone ek corrupt system k khilaaf khade hue ek ahinsavaadi buzurg Dwarika Anand ki kahani dikhayi hai. Yahan bhi unhone apna trademark monotonous style use kiya hai twists-angles mey. Ab ye condition to impossible hai to isme buzurg aur us elake se jude kirdaar aakar naye samikaran banate hai. Mudde ki baat ye hai ki kahani par mehnat nahi ki gayi aesa laga ki Satyagrah, Lokpaal par koi aur movie na bana de us se pehle announce karke jaldi nipta do ye subject. Kahani k angles jinke aane par lagta hai ki ab to maza aayega wo yun hi nikal jaate hai jaise Dwarika Anand k engineer bete ki maut ek accident na hokar conspiracy hona jab khula to bahut dull tareeke se....climax bhi feeka laga.

Message dena hai to dhang se dijiye aese adhpake vyanjan se jiski kahani ya scenes yaad na rahe uska message kaise goonjega? Music mey Salim-Sulaiman k alawa Indian Ocean band dekh kar achchha laga...unka sangeet achchha tha par lyrics behtar ho sakti thi.

Acting mey Amitabh Bachchan ji aur Ajay Devgn ne kasar nahi chhodi hai aur roles k saath nyay kiya hai. Kareena ne bhi apna homework achchhe se kiya hai journalist k role par. Arjun bhi Prakash Jha k favorite ban gaye hai aur Lucknow k kuch chhatr neta yaad aa gaye unhe dekh kar. Amrita Rao typecast ho gayi lagte hai ek jaise kirdaaron ki range mey...journalist agar wo banti to challenge hota (low budget mey experiments karna aur commercial movie mey movie makers ko convince karna alag baaten hoti hai).

P.S. Iske kuch adhure scenes dekh kar Shahid Kapur ki Paathshaala movie ki yaad aa gayi. Matlab movies mey achchha climax hota hai, bura climax hota hai...Paathshaala mey to climax tha hi nahi...he he.  Waise Prakash Jha achchhe director hai par yahan kuch jaldbaazi dikhi unki aur production team ki...Satyagraha se kaafi better Rajneeti thi kyoki usme kum muddo par focus tha, to sabko justified weightage mila aur yahan mudde bahut zyada le liye gaye kahani mey....

421 Brand Beedi Rating - 4/10

421 Brand Beedi Grade - C